जलवायु क्या होता है ? जलवायु कितने प्रकार का होता है ? What is climate? How much types of climate

 

जलवायु (Climate)

 

हम सभी लोग पृथ्वी पर रहते है। पृथ्वी एक ऐसा जगह जहाँ पर हम हर एक मौसम का आनंद ले सकते है। कुछ ऐसे देश हैं जहाँ पर हमेशा गर्मी रहती है,कुछ ऐसे देश हैं जहाँ पर हमेशा ठंडी रहती है तथा कुछ ऐसे देश है जहाँ पर बारिश की संभावना ज्यादा रहती है।

सूचना -अगर आप इस पोस्ट को पूरा पढ़ते है तो में गारंटी लेता हूँ की , जलवायु से सम्बंधित कोई भी सवाल हो उसका जवाब देने में सक्षम होंगे .

What is climate? How much types of climate
Climate

 

हम बहुत सौभाग्य शाली हैं कि हमारा जन्म भारत जैसे महान देश में हुआ है। भारत देश के अधिकतर राज्यो में आपको लगभग हर तरह के मौसम जरूर देखने को मिलेंगे। अगर आप जम्मू-कश्मीर में रहते हैं तो आप ठंडक से भलीभांति वाकिफ होंगे,यदि आप उत्तरी भारत में रहते होंगे तो आप गर्मी से भली भाँति वाकिफ होंगे यदि आप चेरापूंजी जैसे जगह पर रहते होंगे तो आप बारिश से जरूर परिचित होंगे। भारत के कुछ ऐसे राज्य है जहाँ समय- समय से मौसम बदलता रहता है।

अगर हम जलवायु के परिवर्तन की बात करें तो यह लंबे समय की मौसमी दशाओं के औसत पर निर्भर करता है। जलवायु के परिवर्तन में लंबे वक़्त लगते है।जलवायु परिवर्तन में 50 से 60 साल भी लग जाते है लेकिन मौसम के बदलने में ज्यादा समय नहीं लगता है यह घंटे,दिन या सप्ताह में ही बदल जाते हैं।

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भारत देश की जलवायु को प्रभावित करने वाले कुछ कारक

जलवायु को प्रभावित करने वाले अनेक कारक हैं। कुछ मुख्य कारक निम्नलिखित है-

1.वायुदाब एवं पवन सम्बन्धी कारक।

2.स्थिति तथा उच्चावच सम्बन्धी कारक।

वायुदाब एवं पवन सम्बन्धी कारक

भारत की जलवायु को समझने के लिए निम्नलिखित तीन मुख्य कारकों को समझना बहुत जरूरी है-

1.भूमंडलीय मौसम को नियंत्रित करने वाले कारकों एवं विभिन्न वायु सहतियो एवं जेट प्रवाह के अन्तर्वाह द्वारा उत्पन्न ऊपरी वायु संरचना

2.शीतकाल में पश्चिमी विक्षोभों तथा दक्षिणी पश्चिमी मानसून काल में उष्ण कटिबंधीय अवदबो के भारत में अन्तर्व्हन के कारण उत्पन्न वर्षा की अनुकूल दशाएँ।

3. वायुदाब और पवनो का धरातल पर वितरण।

स्थिति तथा उच्चावच संबंधी कारक

स्थिति तथा  उच्चावच संबंधी कारक निम्नलिखित है-

1.जल और स्थल का वितरण।

2.उच्चावच।

3.समुन्द्र तट से दूरी।

4.अक्षांश।

5. समुन्द्र तल् से ऊंचाई।

6.हिमालय पर्वत।

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ग्रीष्म ऋतु में मौसम की क्रिया विधि

 

जेट प्रवाह एवं ऊपरी वायु संचरण

 

वायुदाब एवं पवनो का प्रतिरूप केवल क्षोभमंडल के निम्नस्तर पर पाया जाता है। जून के महीने में प्रायद्वीप के दक्षिणी भाग पर पूर्वी जेट प्रवाह 90 किमी प्रति घंटा की गति से चलता है।

यह जेट प्रवाह अगस्त के महीने में 15 डिग्री उत्तर अक्षांश पर तथा सितंबर महीने में 22 डिग्री उत्तर अक्षांश पर स्थित हो जाता है।तथा ऊपरी वायुमंडल में पूर्वी जेट प्रवाह सामान्यता 30 डिग्री उत्तर अक्षांश से परे नहीं जाता ।

धरातलीय वायुदाब तथा पवने

 

जब गर्मी के मौसम का शुरूआत  होता है तब सूर्यदेव यानि सूर्य उत्तरायण की स्थिति में आ जाता है, उपमहाद्वीप के दोनों स्तर निम्न तथा उच्च स्तरों  पर वायु संचारण में उत्क्रमण हो जाता है। जुलाई के महीने के मध्य तक धरती के निकट निम्नदाब पेटी जिसे अंतःउष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र कहा जाता है।

 उत्तर की ओर खिसक कर हिमालय के लगभग समान्तर 20 डिग्री से 25 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर स्थित हो जाता है। दक्षिणी गोलार्ध से उष्णकटिबंधीय सामुद्रिक वायु संहति विषुवत वृत्त को पार करके सामान्यतः दक्षिण पश्चिमी दिशा में इसी कम दाब वाली पेटी की ओर अग्रसर होती है,यही आर्द्र वायुधारा दक्षिण पश्चिम मानसून कहलाती है।

पूर्वी जेट प्रवाह तथा उष्णकटिबंधीय  चक्रवात

 

इस प्रकार के प्रवाह ,चक्रवातों को लाता है। इस प्रकार के चक्रवात वर्षा के लिए जिम्मेदार होते हैं। इस प्रकार के चक्रवातों की बारंबारता,गहनता,दिशा एवं प्रवाह एक लंबे दौर में भारत की ग्रीष्म कालीन मानसूनी वर्षा के प्रतिरूप के निर्धारण पर पड़ता है।

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मानसून का आरम्भ

 

19वीं सदी के अंत में यह बताया गया कि गर्मी के महीनों में स्थल और समुन्द्र का विभेदी तापन ही मानसून पवनो के उपमहाद्वीप की ओर चलने के लिए मंच तैयार करता है। दक्षिण पश्चिमी मानसून केरल तट पर 1 जून को पहुँचता है,और जल्द ही 10 से 13 जून के बीच ये आर्द्र पवने मुम्बई व् कोलकत्ता तक पहुंच जाती हैं।

 मध्य जुलाई तक संपूर्ण उपमहाद्वीपीय दक्षिण पश्चिम मानसून के प्रभावधीन हो जाता है।
पश्चिमी घाट के साथ -साथ होने वाली अधिकतर वर्षा पर्वतीय होती है,इसका कारण आर्द्र हवाएं अवरुद्ध होकर घाट के सहारे जबरदस्ती ऊपर उठाने से होती है। भारत के पश्चिम तट पर होने वाली वर्षा की तीब्रता दो कारकों से सम्बंधित है जो निम्नलिखित है-

1.अफ्रीका के पूर्वी तट के साथ भूमध्य रेखीय जेट प्रवाह की स्थिति।

2.समुन्द्र तात से घटित होने वाली मौसमी दशाएँ।

मानसून का निर्वतन

 

जब मानसून पीछे हटता है या वापस लौट जाता है तो मानसून का निर्वतन कहलाता है। सितंबर महीने के शुरुआत में उत्तरी-पश्चिमी भारत से मानसून पीछे हटने लगती है और मध्य अक्टूबर तक यह दक्षिण भारत को  के अलावा पूरे भारत में निर्वतित हो जाती है।

लौटती हुई मानसूनी पवने बंगाल के खाड़ी से जल-वाष्प को ग्रहण कर उत्तर पूर्वी मानसून के रूप में तमिलनाडु में वर्षा करती है।

मानसून में विच्छेद

 

दक्षिण तथा पश्चिम के मानसून से समय में जब एक बार वर्षा हो जाती है उसके बाद कई सप्ताह तक वर्षा न होने को मानसून विच्छेद कहलाता है। इस प्रकार के मानसून विच्छेद अलग-अलग क्षेत्रो में अलग-अलग कारणों से हो सकते हैं। जिनमे से कुछ कारण निम्नलिखित है-

1.राज्यस्थान राज्य में मानसून का विच्छेद तब होता है,जब वायुमंडल के निम्नस्तरो पर तापमान की विलोमता वर्षा करने वाली आर्द्र पवनो को ऊपर उठने से रोक देती है।

2.उत्तर भारत के विशाल मैदान में मानसून का विच्छेद  उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की संख्या कम हो जाने से और अंतःउष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र की स्थिति में बदलाव आने से होता है।

3.पश्चिमी तट पर मानसून विच्छेद तब होता है जब आर्द्र पवने तट के सामानांतर बहने लगे।

ऋतुओ की लय

 

भारत की जलवायुवी दशाओं को उसके वार्षिक ऋतू चक्र के माध्यम से सर्वश्रेष्ठ ढंग से ब्यक्त किया जा सकता है। मौसम के वैज्ञानिको ने वर्ष को निम्नलिखित चार भागो में बांटा है-

1. ग्रीष्म ऋतु।

2. शीतऋतु।

3.मानसून के निर्वतन की ऋतू।

4. दक्षिणी पश्चिमी मानसून की ऋतू

ग्रीष्म ऋतु

 

जब गर्मी के मौसम की शुरुआत होती है यानि मार्च के महीने में सूर्य कर्क रेखा की ओर आभासी बढ़त के साथ  ही उत्तरी भारत में तापमान बढ़ने लगता है। अप्रैल,मई, जून क्र महीने में उत्तर भारत में ग्रीष्म ऋतु होती है। मार्च के महीने में दिन का तापमान अधिकतम 38℃ पाया जाता है।

 अप्रैल के महीने में मध्यप्रदेश और गुजरात में यही तापमान 38 से 43 डिग्री सेल्सियस तक हो जाता है। मई तथा जून के महीने में यही तापमान बढ़कर 48℃ तक पहुँच जाती है जो की बहुत ही ज्यादा है। दक्षिण भारत में ऋतू मृदु होती है जिसकी वजह से उत्तर भारत की अपेक्षा में  दक्षिण भारत में तापमान 26℃ से 32℃ के आस-पास ही रहता है।

गर्मी के मौसम में आने वाले कुछ प्रसिद्ध स्थानीय तूफ़ान


1.काल वैशाखी

वैशाख के महीने में पश्चिम बंगाल और असम में शाम के समय चलने वाली भयंकर व् विनाशकारी वर्षायुक्त हवाएं हैं। काल वैशाखी का मतलब वैशाख के महीने में आने वाला तबाही है। असम राज्य में इस तूफ़ान को ‘बारदौली छीड़ा’ कहा जाता है।

2.आम्र वर्षा

गर्मी के मौसम के ख़त्म होने से पहले कुछ मानसूनी बौछारे आती है,जो कर्नाटक तथा केरल के तटीय क्षेत्र के लिए आम बात है। इसे आम्र वर्षा कहने का कारण यह है कि इस वर्षा की वजह से पेड़ पर से आम पकने लगते हैं।

3.लू:
भारत के उत्तरी मैदान में पंजाब से बिहार तक चलने वाली ये काफी गर्म व परेशानी देने वाली हवाएं हैं। पटना तथा दिल्ली के बीच इनकी गति काफी ज्यादा होती है।

शीतऋतु

 

शीतऋतु उत्तरी भारत में नवम्बर के महीने से शुरू हो जाती है। उत्तरी भारत में दिसम्बर व् जनवरी  के महीनो में सबसे ज्यादा ठंडी पड़ती है। दिन के समय में तापमान 15℃ तक आ जाता है तथा रात के समय  में भारत के कुछ क्षेत्र जैसे राजस्थान में 0℃ तक तापमान पहुँच जाता है।

शीतऋतु में उत्तरी भारत में अधिक ठंडक होने का मुख्य कारण निम्नलिखित है-

1 . भारत में शीत लहर  ले आती है जिसकी वजह से देश के उत्तर पश्चिम भागो में कोहरा व् पाला पड़ता है।

2. राजस्थान,पंजाब तथा हरियाणा जैसे राज्य समुन्द्र के समकारी प्रभाव से दूर स्थित होने के कारण महाद्वीपीय जलवायु का अनुभव करते है।

3.निकटवर्ती हिमालय की श्रेणियो में हिमपात के कारण शीतलहर की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

मानसून के निर्वतन की ऋतू

 

मानसून के निर्वतन की ऋतू अक्टूबर तथा नवम्बर के महीने को कहा जाता है। मानसून के निर्वतन की ऋतू के समय में आकाश एक दम साफ हो जाता है।जमीन में नमी रहती है,उच्च तापमान और आर्द्रता की दशाओं से मौसम अधिक कष्टकारी हो जाता है। इसे कार्तिक मास की ऊष्मा भी कहा जाता है।

 अक्टूबर महीने के अंत तक तापमान गिरने लगता है। इस ऋतु की व्यापक वर्षा का सम्बन्ध चक्रवातीय अवदबो के मार्गो से है,जो अंडमान समुन्द्र में से शुरू होते हैं और दक्षिण प्रायद्वीप के पूर्वी तट को पार करते हैं। ये उष्णकटिबंधीय चक्रवात अत्यंत विनाशकारी होते हैं।

दक्षिणी पश्चिमी मानसून की ऋतू

 

मई के महीने में उत्तर पश्चिमी मैदानों में तापमानों के तेज़ी से बढ़ने के कारण वायुदाब की दिशाएं और अधिक गहराने लगती है,जून की शुरुआत में ये दशाएँ इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि वे हिन्द महासागर से आने वाली गोलार्ध की व्यापारिक हवाएं भूमध्य रेखा को पार करके बंगाल की खाड़ी व् अरब सागर में प्रवेश कर जाती है।

भूमध्यरेखीय गर्म समुंद्री धाराओं के ऊपर गुजरने के कारण ये हवाएं अपने साथ पर्याप्त मात्रा में आर्द्रता लाती है। भूमध्य रेखा को पार करके इनकी दिशा दक्षिणी -पश्चिमी हो जाती है। जिसके कारण इन्हें दक्षिण -पश्चिमी मानसून कहा जाता है।

भूखंड पर मानसून ड़ो शाखाओं में पहुँचती हैं-

1.बंगाल की खाड़ी की शाखा।

2.अरब सागर की शाखा।

शीतऋतु में मौसम की क्रियाविधि

 

धरातलीय वायुदाब तथा पवने

शीतऋतु में भारत का मौसम मध्य एवं पश्चिम एशिया में वायुदाब का वितरण से प्रभावित होता है। इस समय हिमालय के उत्तर में तिब्बत पर उच्च वायुदाब केंद्र स्थापित हो जाता है।मध्य एशिया के उच्च वायुदाब केंद्र से बाहर की ओर चलने वाली धरातलीय पवने भारत में शुष्क महाद्वीपीय पवनो के रूप में पहुँचती है।

जेट प्रवाह और ऊपरी वायु परिसंचरण

ऊपरी वायु संचारण के निर्माण में पृथ्वी के धरातल के निकट वायु मंडलीय दाब की भिन्नताओं की कोई भूमिका नहीं होती है। 9 से 13 किलोमीटर की ऊंचाई पर समस्त मध्य एवं पश्चिम एशिया पश्चिम से पूर्व बहने  वाली पछुआ हवा के प्रभावधीन होता है।

पश्चिम चक्रवातीय विक्षोभ तथा उष्ण कटिबंधीय चक्रवात
पश्चिमी विक्षोभ,जो भारतीय उपमहाद्वीप में जाड़े के समय पश्चिम तथा उत्तर पश्चिम से प्रवेश करते है,भूमध्य सागर पर उत्पन्न होते है।भारत में इनका प्रवेश पश्चिमी जेट प्रवाह द्वारा होता है। शीतकाल में रात के समय जब तापमान में वृद्धि होती है तो इन विक्षोभों का आने का संकेत माना जाता है।

 तथा उष्ण कटिबंधीय चक्रवात बंगाल की खाड़ी तथा हिन्द महासागर में उत्पन्न होते हैं। इन उष्णकटिबंधीय चक्रवातों से तेज गति से हवाएं चलती है,जिसके परिणाम स्वरुप भरी बारिश होती है। इस प्रकार के चक्रवात आंध्र प्रदेश,उड़ीसा तथा तमिलनाडु के तटीय भागो से टकराते हैं.

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मानसूनी वर्षा की विशेषताएं

1.ग्रीष्म कालीन वर्षा मूसलाधार होती है,जिससे पानी बहने की वजह से मृदा का अपरदन होता है।

2.दक्षिण पश्चिमी मानसून से प्राप्त होने वाली वर्षा मौसमी है,जो जून से सितम्बर के दौरान होती है।

3. मानसूनी वर्षा का स्थानिक वितरण भी आसमान है,जो 12 सेमी से 250 सेमी से अधिक वर्षा के रूप में पाया जाता है।

4. भारत की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में मानसून का अत्यधिक महत्व है,क्योंकि देश में होने वाली कुल वर्षा का तीन चौथाई भाग दक्षिण पश्चिमी मानसून की ऋतू में प्राप्त होता है।

5.समुन्द्र से बढ़ती दूरी के साथ मानसून वर्षा में घटने की प्रवृति पाई जाती है। दक्षिण पश्चिम मानसून अवधि में कोलकत्ता में 119 सेमी पटना में 105 सेमी इलाहाबाद में 76 सेमी तथा नई दिल्ली में 56 सेमी वर्षा होती है।

6. कई बार वर्षा सामान्य समय से पहले समाप्त हो जाती है। इससे कड़ी फसले को तो नुकसान पहुंचाता है और साथ में शीतकालीन फसलों को भी बोने में परेशानी होती है।

भारत की परंपरागत ऋतुओ के नाम

 

ऋतू       भारतीय कैलेंडर के      ग्रेगेरियन कैलेंडर के।
हिसाब से महीनों के नाम  हिसाब से महीने ।

शिशिर  – माघ-फाल्गुन        –       जनवरी-फरवरी।
बसंत   –  चैत्र-वैशाख             –       मार्च-अप्रैल
ग्रीष्म   –  ज्येष्ठ-आषाढ़         –       मई-जून।
वर्षा   –    श्रावण-भाद्र          –      जुलाई-अगस्त।
शरद       अश्विन-कार्तिक       –      सितम्बर-अक्टूबर।
हेमंत         मार्गशीष-पौष।       –     नवम्बर-दिसम्बर।

जलवायु के प्रकार

 

लघु शुष्क ऋतू वाला मानसून प्रकार – Amw

गर्म मरुस्थल –  BWhw

ध्रुवीय प्रकार – E

शुष्क शीत ऋतु वाला मानसून प्रकार -Cwg

शुष्क ग्रीष्म ऋतु वाला मानसून प्रकार -As

लघु ग्रीष्म तथा ठंडी आर्द्र शीत ऋतु वाला जलवायु वाला प्रदेश -Dfc

उष्ण कटिबंधीय सवाना प्रकार – Aw

अर्ध शुष्क स्टेपी जलवायु-BShw

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