मृदा क्या होता है,तथा मृदा कितने प्रकार का होता है?

 मृदा क्या होता है,तथा मृदा कितने प्रकार का होता है?

मृदा तथा उसके प्रकार

क्या आपने कभी खेती किया है? अगर आपने खेती किया होगा तो जरूर आपके दिमाग में आया होगा कि जिस खेत में आप खेती कर रहे है उसकी मिटटी कौन सी है ,काली है या लाल या पीली है या जलोढ़ है या अन्य किसी प्रकार का मिटटी है।

मृदा क्या होता है,तथा मृदा कितने प्रकार का होता है?
Types Of Soil

 

आपने अक्सर देखा होगा कि किसी-किसी के खेत में फसल अधिक उत्पादन होता है ,और किसी के खेत में बहुत कम। इसका का सबसे बड़ा कारण उस जगह की मिट्टी होता है।

 यदि हम किसी जगह पर एक गड्ढा खोदते है तो हमें मृदा या मिटटी की तीन परते दिखाई देते है,  तीनो परतों के मेल को संस्तर कहते है।

इन तीनो परतों में सबसे ऊपरी परत ‘क’ संस्तर होता है। इस ऊपरी परत में पौधों को बृद्धि प्रदान करने के लिए आवश्यक खनिज पदार्थ,पोषक तत्व तथा जल से संयोग होता है। ‘ख’ संस्तर मृदा का मध्य का परत होता है,जिसमे ‘क’ संस्तर तथा ‘ग’ संस्तर दोनों से पदार्थ प्राप्त होते हैं।

इसमें कुछ जैव पदार्थ तथा कुछ खनिज पदार्थ  का अपक्षय साफ दिखाई देता है। ‘ग’ संस्तर की रचना ढीली जनक सामग्री से होता है। यह मृदा निर्माण प्रक्रिया में प्रथम अवस्था होती है। और ऊपर की दो परते इसी परत से बनी होती है। परतों की इस व्यवस्था को मृदा परिछेदिका कहते है।

इन तीनो संस्तरों के नीचे एक चट्टान भी पाई जाती है जिसे जिसे अधारी चट्टान या जनक चट्टान कहते है।

मृदा का वर्गीकरण

भारत में मृदा विज्ञानं के जनक लैदर माने जाते हैं।


भारत देश में अनेक प्रकार की पेड़ पौधे, उच्चावच,भूआकृति जलवायु परिमंडल पाई जाती है जिनका अनेक प्रकार की मृदा विकास में विशेष योगदान रहा है।

पुराने समय यांनी प्राचीन काल में मृदा को दो भागों में बांटा गया था-
1. उर्वर।
2.ऊसर।

उर्वर मृदा उपजाऊ होती थी तथा ऊसर मृदा  अनुउपजाऊ होती थी। 16वीं शताब्दी में मृदा का वर्गीकरण उनकी विशेषताओं तथा बाहरी लक्षणों के आधार पर किया जाता था।

मृदा का वर्गीकरण उसके रंग ढंग,गठन,भूमि के ढाल तथा मिटटी के नमी के आधार पर किया जाता था। उस समय के कुछ प्रमुख मृदाएं के नाम इस प्रकार थे- पांशु, मृण्मय,दुमट तथा बलुई आदि।
सन 1950 के बाद अनेक अनेक संस्थानों द्वारा मृदा का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया गया।

सन 1956 में भारत के मृदा सर्वेक्षण विभाग ने कुछ चुने हुए क्षेत्र जैसे- दामोदर घाटी और अन्य क्षेत्रो में मृदाओं का व्यापक अध्ययन किया गया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् ने मृदा के बहुत बार परिक्षण किया जिसमें उन्होंने मृदाओं को उनके प्रकृति तथा उनके गुणों के आधार पर वर्गीकृत किया गया।

यह वर्गीकरण संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि विभाग मृदा वर्गीकरण पद्धति पर आधारित है।
भारत की मिट्टियों को निम्नलिखित क्रम में वर्गीकृत किया गया है-

क्रम               क्षेत्र हजार हेक्टेयर में      प्रतिशत

1.अल्टीसोल्स8250.00             –   2.51
2.एंटीसोल्स92131.71         –       28.08
3.वर्टिसोल्स –  27960.00        –        8.52
4.इंसेप्टीसोल्स130372.90    –       3974
5.एरिडिसोल्स – 14069              –      4.28
6.एल्फिसोल्स44448.68         –       13.55
7.मालीसोल्स   –1320.00           –        0.40
8.अन्य  –           9503.10            –       2.92

भारत की मृदा को उत्पति,संयोजन,रंग तथा अवस्थिति के आधार पर निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया गया है-

1.जलोढ़ मृदा।
2.पीटमय मृदा ।
3.काली मृदा।
4.वन मृदा।
5.लाल और पीली मृदायें।
6.लवण मृदा।
7.शुष्क मृदा।
8.लैटेराइड मृदा।

जलोढ़ मृदा

इस प्रकार की मृदा नदियों तथा घाटियों के विस्तृत मैदान में में पाई जाती है। भारत देश के कुल क्षेत्रफल के लगभग 40% हिस्सा जलोढ़ मृदा से भरा पड़ा है।

जलोढ़ मृदा निक्षेपण मृदा है जिसको नदियों तथा सरिताओं ने बहाकर निक्षेपित किया है। जलोढ़ मृदा आपको राजस्थान के एक संकीर्ण गलियारे से लेकर गुजरात के मैदान तक दिखाई देगी।

समुन्द्र के पास पड़ने वाले प्रदेश में ये पूर्वी तट की नदियों के डेल्टाओं और नदियों की घाटियों में पाई जाती है।
इस प्रकार की मृदा की बनावट बलुई दुमुट तथा चिकनी मिटटी की तरह होती है।

इस प्रकार की मृदा में पोटाश की मात्रा काफी अधिक पाई जाती है तथा अगर फास्फोरस की बात करे तो इसमें फास्फोरस काफी कम पाई जाती है। गंगा नदी के ऊपरी और मध्यवर्ती  फैले हुये क्षेत्र में दो प्रकार की अलग-अलग मृदाओं का विकास हुआ है, जिनका नाम ‘बांगर’ तथा ‘खादर’ है।

 अगर बांगर मृदा की बात करे तो यह एक महीन चट्टानों से से बनी हुई पुरानी मृदा होती है,तथा यह बाढ़ के पहुँच से दूर होती है। अगर खादर मृदा की बात करे तो यह मृदा प्रतिवर्ष नदियों में बाढ़ आने से, नदियों के किनारे नया चट्टानी महीन मृदा बाहर निकलती है, और यही मृदा नदी के आस -पास जम जाती है।

  खादर मृदा की उर्बरता भी काफी अच्छी होती है, इस प्रकार की मृदा में कंकड़ काफी अधिक पाया जाता है। नदियों में पश्चिम से पूर्व की तरफ जाने पर मृदा में बालू की मात्रा घटती जाती है।

पीटमय मृदा

इस प्रकार की मृदा का रंग गधे और काले रंग की होती है। ये मृदा भारी वर्षा तथा उच्च आर्द्रता वाले क्षेत्रों में पाई जाती है। इन प्रकार की मृदाओं में लगभग 50% तक जैव पदार्थ पाये जाते है।

 इसमें ह्यूमस की भी मात्रा पर्याप्त पाई जाती है। ये मृदायें ज्यादातर पश्चिम बंगाल के तटीय क्षेत्र,बिहार के उत्तरी भाग ,तमिलनाडु,उड़ीशा तथा उत्तरांचल के दक्षिणी भागो में पाए जाते है।

काली मृदा

यह मृदा देखने में एक दम काली दिखती है तथा इस मृदा का अधिकतर भाग दक्कन के पठार में पाई जाती है। यह मृदा आंध्र प्रदेश ,गुजरात,तमिलनाडु के कुछ भागों में तथा महाराष्ट्र के कुछ भागों में पाई जाती है।

 इस प्रकार की मृदा कृष्णा नदी तथा गोदावरी के किनारे के ऊपरी भागो तथा दक्कन के पठार के उत्तरी व् पश्चिमी भागो में पाई जाती है।।इस मिटटी में कपास की खेती अच्छे तरह से होता है इसलिए इसे कपास वाली काली मिट्टी भी कहते है।

इस प्रकार की मृदायें गहरी,मृण्मय तथा अपारगम्य होती हैं। अगर आप काली मिट्टी में पानी डालते हो तो यह फूल जाती है और यह चिपचिपाहट के साथ चिपकती है। अगर आप इस मिटटी को सुखा देते हैं तो यह सिकुड़ जाती है। गर्मी के मौसमो में यह मिटटी फटने लगती है और इसमें बड़ी -बड़ी दरारे पड़ने लगती है।

 काली मृदा में लौह,चूना, मैंग्नीशियंम,एलुमिना के तत्व काफी मात्रा में पाये जाते हैं। अगर फास्फोरस,नाइट्रोजन तथा जैव पदार्थो की बात करे तो इसमें ये सब नहीं पाए जाते है। इसमें पोटाश की मात्रा थोड़ा बहुत पाई जाती है।

वन मृदायें

ये मृदायें ज्यादातर पर्याप्त वर्षा वाले वन क्षेत्रों में ही पाये जाते है।वन मृदाओं का निर्माण पर्वतीय पर्यावरण में होता है तथा पर्यावरण में परिवर्तन के साथ मृदाओं का गठन तथा संरचना भी बदल जाता है।

वन मृदा की आकृति दुमति तथा पांशु होती है। ये मृदा ऊपरी ढालो पर मोटी कड़ो के रूप में पाई जाती है। ये मृदायें कम ह्यूमस तथा अम्लीय होते है। जो मृदायें निचली घाटियों में पाई जाती है वो उर्बर होती है।

लाल और पीली मृदा

लाल मृदा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में जहाँ पर रवेदार आग्नेय चट्टान होते है तथा दक्कन के पत्थर के पूर्वी तथा दक्षिणी भागो में पाई जाती है। लाल दुमटी मृदा पश्चिमघाट के गिरिपद क्षेत्र में एक लंबी पट्टी के रूप में पाई जाती है। लाल तथा पीली मिटटी मध्य गंगा मैदान के दक्षिणी भागो में  तथा छत्तीसगढ़ और उड़ीशा के कुछ भागों में पाई जाती है।

 ये सामान्यता महीन कणो से बनी होती है। लाल मृदा के लाल होने का कारण रवेदार तथा चट्टानों में लोहे की मात्रा होने के कारण होती है तथा इस मिटटी का पीला होने का कारण इसमें जलयोजित है। जलयोजित की वजह से यह पीला दिखाई पड़ता है।

लवण मृदा

इस प्रकार की मृदाओं में पोटैशियम,मैंगनीशियम,तथा सोडियम का अनुपात अधिक होता है। लवण मृदा को ऊसर मृदा भी कहते है। लवण मृदा में किसी भी प्रकार की वनस्पति नहीं उगती है ।

 इस प्रकार की मृदा में लवण के बढ़ने का कारण शुष्क जलवायु और ख़राब अपवाह है। इस प्रकार की मिट्टी की आकृति बलुई से लेकर दुमटि तक होती है। इस प्रकार की मृदा में चूने तथा नाइट्रोजन की मात्रा कम होती है। इस प्रकार के मृदा में नमक की मात्रा पाई जाती है।

 डेल्टा प्रदेशो में समुंद्री जल के भर जाने पर लवण मृदाओं के विकास को बढ़ावा मिलता है। अत्यधिक सिंचाई वाले गहन कृषि क्षेत्रो में  उपजाऊ जलोढ़ मृदायें भी लवण मृदाओं में बदलती जा रही है। इस प्रकार की मृदा से नमक प्राप्त करने में काफी सहायक होती है।

 हरियाणा तथा पंजाब के कुछ क्षेत्रों में मृदा में लवणता के अधिकता होने के कारण लवणता से निपटने के लिए जिप्सम डालने की सलाह दी जाती है।

शुष्क मृदा

इस प्रकार की मृदा का रंग लाल से लेकर किश्मीशी तक होता है। इस प्रकार के मिटटी की संरचना बलुई तथा प्रकृति से लवणीय होता है। इस प्रकार की मृदा में नमक की मात्रा पाई जाती है,जिसे आप वाष्पीकरण करके नमक प्राप्त कर सकते है।

 उच्चतापमान,शुष्क जलवायु तथा जल्द वाष्पीकरण के कारण इस प्रकार की मृदा में नमी बहुत कम होती है। इसमें फास्फेट सामान्य मात्रा में पाई जाती है। इसमें नाइट्रोजन नहीं पाया जाता है। इसमें चूने की मात्रा अधिक होने के कारण निचले संस्तरों में कंकरीट की मात्रा पाई जाती है।

यदि इन मृदा में सिंचाई किया जाता है तो इस मिटटी में उगने वाले पौधो के लिए कुछ वक्त लिए नमी पड़ा रहता है जो पौधों के बृद्धि में सहायक होते है। पौधे के पास नमी रुकने का कारण मृदा के नीचे पाई जाने वाली कंकडों की परतें है।

इस प्रकार की मृदायें शुष्क स्थलाकृति वाले पश्चिम राज्यस्थान में पाए जाते है। इन मृदाओं में जैव पदार्थो तथा ह्यूमस की मात्रा कम होने के कारण ये अनुवर्र होती है।

लैटेराइट मृदा

इस प्रकार की मृदा उच्च तापमान तथा भरी बारिश वाले स्थानों पर पाई जाती है। ‘लैटेराइड ,’मृदा का शब्द लैटिन भाषा के ‘लेटर’ शब्द से लिया गया है। लैटेराइड मृदा उष्णकटिबंधीय वर्षा के कारण हुए तीव्र निक्षालन के कारण इसका विकास हुआ है।

जब वर्षा होती है तो उसके कारण  सिलिका तथा चूना तो निक्षालन हो जाते है लेकिन अलुमिनियम तथा लोहे के ऑक्साइड से भरी मृदायें बची रह जाती है। लैटेराइड मृदाओं में नाइट्रोजन,जैव पदार्थ,कैल्सियम तथा फास्फेट की कमी होती है और पोटाश और लोहा ऑक्साइड की अधिकता होती है। यही कारण है कि लैटेराइड मृदा खेती के लायक बिलकुल भी नहीं है।

 अगर आप इन मृदा में खेती करना चाहते है तो आपको इसमें अधिक मात्रा में खाद और उर्बरक डालना पड़ेगा। इस प्रकार की मिट्टी केरल,आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु जैसे राज्यो में काजू की खेती के लिए ये मिटटी अधिक उपयोगी है।

इस प्रकार की मिट्टी का प्रयोग हम ईंटो को बनाने में करते है। इस मिटटी का ज्यादातर विकास प्रायद्विपीय पठार के क्षेत्रो में हुआ है। यह मृदा ज्यादातर मध्यप्रदेश,कर्नाटक, तमिलनाडु,उड़ीशा तथा असम के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।

मृदा अपरदन

मृदा का अपरदन मृदा के लिए काफी नुकसानदायक होता है। जब मृदा के आवरण का विनाश होता है,तो यह क्रिया मृदा अपरदन कहलाती है। मृदा अपरदन का कारण कुछ प्राकृतिक तथा मानवीय कारणों के संतुलन के बिगड़ने से होता है। संतुलन बिगड़ने से मृदा के अपरदन की दर बढ़ जाती है।

मृदा के दो शक्तिशाली कारण मृदा को हटाना तथ्य उसका परिवहन करना है। देश की लगभग 8000 हेक्टेयर जमीन प्रतिवर्ष बीहड़ में बदल जाती है। मृदा अपरदन किसानों के लिए बहुत गंभीर समस्या है। कुछ नदियों के घाटियों पर अपरदित पदार्थ जमा हो जाते है जिसकी वजह से जल प्रवाह की क्षमता कम हो जाती है।

 जल प्रवाह की क्षमता कम होने की वजह से बाढ़ आने की समस्या बढ़ जाती है जिससे किसानों के कृषि में काफी ज्यादा नुकसान हो जाता है। भारत के सिंचित क्षेत्रो में कृषि योग्य भूमि काफी बड़ा भूमि का काफी बड़ा भाग अति सिंचाई के प्रभाव से लवणीय होता जा रहा है।

भारत की भूमि की बात करूँ तो भारत के कुल भूमि का लगभग 50% भाग किसी न किसी मात्रा में अवकर्षण से प्रभावित है।

मृदा अवकर्षण

मृदा का अवकर्षण मृदा के उर्वता के हास् होने के कारण होता है। मृदा के हास् होने के कारण मृदा का पोषण स्टार गिर जाता है तथा अपरदन और दुरूपयोग के कारण मृदा की गहराई कम हो जाती है।

 मृदा के नुकसान का जिम्मेदार मृदा अवकर्षण है। मृदा अवकर्षण पवनो की गति,वर्षा की मात्रा और भूआकृति के अनुसार मृदा अवकर्षण एक जगह से दूसरे जगह पर भिन्न होता है।

 

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