वन क्या होता है ? वन कितने प्रकार का होता है? What is forest,How much types of forest in hindi

वन क्या होता है ? वन कितने प्रकार का होता है?

 

जिस जगह पर वृक्षो की अधिकता होती है उसे हम वन कहते हैं।

अगर आप इस पोस्ट को पूरा पढ़ते है तो में गारंटी लेता हूँ की ,वन से सम्बंधित कोई भी सवाल हो उसका जवाब देने में सक्षम होंगे .

वन क्या होता है ? वन कितने प्रकार का होता है? What is forest,How much types of forest in hindi
वन के प्रकार

 

आपने कई प्रकार के वन देखे होंगे, कुछ वन ऐसे होते है जो प्रकृति के द्वारा अपने आप उगते है तथा कुछ वन ऐसे होते है जो हम या आप के द्वारा लगाए होते है। प्राकृतिक वनस्पति ऐसे वनस्पति होते है जहाँ पर पौधे बिना किसी हस्तक्षेप के लंबे समय से उगते चले चले आते है।

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 इस प्रकार के वनों के वृक्ष अपने आप को  वहाँ पर पाई जाने वाली मिटटी में अपने आप को अच्छी तरह से ढाल लेती है।लेकिन हमारे और आपके द्वारा लगाए गए वृक्षो पर हमें हमेशा ध्यान देना पड़ता है।

भारतीय वनस्पतियों को जलवायु परिस्थतियों के आधार पर बांटा गया है जो इस प्रकार है-
वनों के प्रकार

1.उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन।
2.वेलांचली व् अनूप वन।
3.उष्ण कटिबंधीय सदाबहार एवं अर्धबहार वन।
4.पर्वतीय वन।
5.उष्ण कटिबंधीय कांटेदार वन।

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उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन

भारत में इस प्रकार के वन बहुत ही ज्यादा मानसून के समय में पाए जाते है इसलिए इस प्रकार के वन को मानसूनी वन भी कहते है। ये वन ज्यादातर 70 सेमी से 200 सेमी वर्षा वाले क्षेत्रों में ही पाये जाते है। उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन को जल की उपलब्धता को देखते हुए आद्र पर्णपाती वन तथा शुष्क पर्णपाती वन में बांटा गया है।

अगर आद्र वन की बात करे तो यह 100 सेमी से 200सेमी वर्षा वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। और शुष्क पर्णपाती वन उन क्षेत्रों में पाये जाते है जहाँ पर 70 सेमी से 100 सेमी के बीच वर्षा होती है।

 आर्द्र प्रपाती वन भारत के उत्तर पूर्वी राज्यो में ,पश्चिम घाट के पूर्वी ढालो में ,उड़ीशा तथा हिमालय के गिरिपद में पाये जाते है। इस प्रकार के वनों में सेमल,महुआ,चन्दन,शीसम, सागवान,हुर्रा आदि प्रकार के वृक्ष शामिल हैं।

शुष्क पर्णपाती वन उत्तर प्रदेश तथा विहार के मैदानी भागों में पाए जाते है,जहाँ सागवान के वृक्ष के साथ अन्य प्रकार के वृक्ष तथा घास -फूस उगते है।

 जब शुष्क ऋतू शुरू होती है तो इस प्रकार के वनों के वृक्षो के पत्ते झड़ने लगते है। इस प्रकार के वनों में खैर,तेंदू,पलास,अकलवुड तथा बेल आदि प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं।

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वेलांचली व् अनूप वन

भारत में अलग-अलग प्रकार के आद्र व् अनूप आवास पाये जाते है। इन आवासों के 70%भागो पर चावल की खेती की जाती है। भारत में आर्द्र भूमि की बात करे तो लगभग 39 लाख हेक्टेयर भूमि आर्द्र है।

हमारे भारत देश के आर्द्र भूमि को आठ प्रकार के वर्गों में बांटा गया है, जो निम्नलिखित प्रकार है-

1. गुजरात व् राजस्थान से पूर्व और मध्यप्रदेश की ताज़ा जल वाली झीलें व् जलाशय।

2.कश्मीर और लद्दाख की पर्वतीय झीलें और नदियाँ।

3.दक्षिण में दक्कन पत्थर के जलाशय और दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र की लैगून व् अन्य आद्र भूमि।

4.अंडमान निकोबार द्वीप समूह के द्वीप चापो के मैंग्रोव वन और दूसरे आद्र क्षेत्र।

5.राजस्थान गुजरात व् कक्ष की खारे जल वाली भूमि।

6.भारत के पूर्वी तट पर डेल्टाई आर्द्र भूमि व् लैगून।

7. गंगा के मैदान में ताज़ा जल वाले कच्छ क्षेत्र।

8.ब्रह्मपुत्र घाटी में बाढ़ के मैदान व् उत्तर पूर्वी भारत और हिमालय गिरिपद के कच्छ एवं अनूप क्षेत्र।

उष्ण कटिबंधीय सदाबहार एवं अर्ध सदाबहार वन

इस प्रकार के वन उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के पहाड़ियों पर ,पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढाल पर,और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में पाए जाते है। इस प्रकार के ज्यादातर वन उष्ण और आर्द्र क्षेत्रो में पाए जाते है। जहाँ पर साल में 200 सेमी से अधिक वर्षा तथा 22℃ से अधिक तापमान रहता है

इस प्रकार के वन वही पर पाये जाते हैं। उष्ण कटिबंधीय वन के वृक्ष बहुत नजदीक-नजदीक होते है जहाँ पर वृक्षो के पास झाड़ियां और बेले भी होती हैं। और इस प्रकार के वनों के वृक्षो की लंबाई 55 मीटर या उससे ऊपर भी हो सकती है।

 इन वनों में पाए जाने वाले सभी वृक्ष अलग -अलग तरह के होते है,जिससे यदि किसी वृक्ष के पत्ते झड़ते है तो किसी बृक्ष के पत्ते उगते है इसलिए यह वन हमेशा हरा भरा दिखाई देता है । इसलिए इस वन को सदाबहार वन भी कहते है। इस वन में पाई जाने वाली मुख्य वृक्षो की प्रजातियां ऐनी, एबनी, रोजवुड,महोगनी है।

अर्ध सदाबहार वन भी इन्ही क्षेत्रो में पाए जाते है, जहाँ पर कम वर्षा होता है। इनमे मुख्य वृक्षो की प्रजातियां होलक,साइडर,कैल है।

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पर्वतीय वन

पर्वतीय क्षेत्रों में पाये जाने वाले वन पर्वतीय वन कहलाते है। पर्वतीय क्षेत्रों में ऊंचाई होने के कारण तापमान घटते है तथा इसके साथ प्राकृतिक वनस्पतियों में भी बदलाव आता है। पर्वतीय वनों को दो भागों में बांटा गया है-

1. उत्तरी पर्वतीय वन।
2.दक्षिणी पर्वतीय वन।

ऊंचाइयां बढ़ने के कारण हिमालय के पर्वत श्रंखला में उष्ण कटिबंधीय वनों से टुंड्रा में पाई जाने वाली प्राकृतिक वनस्पतियां पाई जाती है। हिमालय के गिरिपद पर पर्णपाती वन भी पाये जाते है। 1000 मीटर से 2000 मीटर तक की ऊंचाई पर आर्द्र शीतोष्ण कटिबंधीय प्रकार के वन भी पाये जाते है।

उत्तरी पर्वतीय वन

भारत के उत्तरी पूर्वी उच्चतर पहाड़ी श्रृंखलाओ पश्चिम बंगाल और उत्तरांचल के पहाड़ी इलाको में चौड़े पत्ते वाले ओक और चेस्टनट जैसे सदाबहार वन पाये जाते है। इस प्रकार के क्षेत्रो में 1500 से 1750 मीटर की ऊंचाई पर व्यापारिक महत्त्व वाले चीड़ के वृक्ष भी पाये जाते है।

हिमालय के पश्चिमी भाग में देवदार के वन पाये जाते है जिसकी लकड़ी बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसी तरह चिनार तथा वालन के भी बृक्ष पाये जाते है, जिसकी लकड़ी कश्मीर हस्तशिल्प के रूप में ज्यादा इस्तेमाल होती है। हिमालय के पश्चिमी क्षेत्र में स्प्रूस और ब्लूपाइन 2224 मीटर से 3047 मीटर तक की ऊंचाई पर पाये जाते हैं।

 इतने ऊंचाई के ऊपर भी कई स्थानों पर शीतोष्ण कटिबंधीय घास भी उगते है। तथा इससे अधिक ऊंचाई पर चारागाह तथा एल्पाइन वन पाये जाते है। 3000 मीटर से 4000 मीटर की ऊंचाई पर जुनिपर,रोडोडेंड्रॉन बर्च सुर सिल्वरफर आदि प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं।

कुछ समुदाय जो ऋतू में  प्रवास करते है ,जैसे – गद्दी,बकरवाल,गुज्जर आदि इन चरागाहों का पशुचारण के लिए भरपूर प्रयोग करते है। शुष्क उत्तरी ढालो की तुलना में दक्षिणी भागो में वनस्पतियां अधिक पाई जाती है इसका कारण  हिमालय के दक्षिणी भागो में अधिक वर्षा है।

दक्षिणी पर्वतीय वन

इस प्रकार के वन प्रायद्वीप के तीन भागों में मिलते है-
1.विध्यांचल।
2.पश्चिमी घाट।
3.नीलगिरी पर्वत श्रृंखला

इनकी समुन्द तल से ऊंचाई लगभग लगभग 1500 मीटर के करीब है,जिसकी वजह से यहाँ के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में शीतोष्ण कटिबंधीय और निचले क्षेत्रो में उपोष्ण कटिबंधीय प्राकृतिक वनस्पति पाई जाती है।

 कुछ राज्य जैसे तमिलनाडु,कर्नाटक तथा केरल के पश्चिम घाटों में इस तरह की वनस्पतियां खास कर पाई जाती है। इन वनों के पाये जाने वाले वृक्ष जैसे-सिनकोना,मैगनोलिया,वैतल और लैरल का महत्त्व बहुत ही ज्यादा है।

उष्ण कटिबंधीय कांटेदार वन

इस प्रकार के वन भारत के उस भागो में पाए जाते है जहाँ पर वर्षा 50 सेमी से कम होती है। इस प्रकार के वनों में कई प्रकार के घास-फूस झाड़ियां आदि पाई जाती हैं। इस प्रकार के वन भारत के दक्षिणी पश्चिमी राज्य जैसे-गुजरात,पंजाब,मध्यप्रदेश,हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश के अर्ध शुष्क क्षेत्रो में पाये जाते हैं।

 इस तरह के वनों में पत्ते हमेशा पेड़ो से लगे रहते है और झाड़ियां भी इनसे सटी रहतीं है। इसमें कुछ मुख्य वृक्ष पाये जाते हैं जो इस प्रकार है- खेजड़ी,खैर, खजूर,बबूल, पलास, बेर आदि। इस प्रकार के वनों में पाए जाने वाले वृक्षो के नीचे घास उगती है जिनकी लंबाई लगभग 2 मीटर के करीब होता है।

वन संरक्षण

वन एक ऐसा चीज़ है जो हमें आर्थिक व् सामाजिक रूप से लाभ पहुचते हैं। वनों की वजह से हमारा पर्यावरण काफी शुद्ध रहता है। भारत सरकार ने सन 1952 में वन संरक्षण नीति लागू किया जिसे बाद में सन 1988 में संशोधित किया गया।सन 1988 के नीति के अनुसार भारत सरकार सत्तपोषणीय वन प्रबंध पर बल देगी, जिससे एक तरफ वन संसाधनों के संरक्षण का विकास किया जायेगा और दूसरी तरफ स्थानीय लोगो की आवश्यकताओं को पूरा किया जायेगा।

इस नीति के कुछ नियम है जो इस प्रकार है-


1.देश की प्राकृतिक धरोहर ,जैव विविधता तथा आनुवंशिक पूल का संरक्षण।

2.पेड़ लगाने के लिए बढ़ावा देने के लिए ,पेड़ो की कटाई रोकने के लिए जन आंदोलन चलाना जिसमें महिलाएं भी शामिल हो,ताकि वनों पर दबाव कम हो।

3. देश में 33% भाग पर वृक्षो को लगाना,जो वर्तमान राष्ट्रीय स्तर से 6% अधिक है।

4.वनों की उत्पादकता बढाकर वनों पर निर्भर ग्रामीण जनजातियों को इमारती लकड़ी,ईंधन,चारा और भोजन उपलब्ध कराना और लकड़ी के स्थान पर अन्य वस्तुओं को प्रयोग में लाना।

5. पर्यावरण संतुलन बनाये रखना तथा पारिस्थतिकी असंतुलन वाले क्षेत्रों में वन लगाना।

6.निम्नीकृत भूमि पर सामाजिक वानिकी एवं वन रोपण द्वारा वन आवरण का विस्तार।

7. मृदा अपरदन और मरुस्थलीकरण रोकना तथा बाढ़ व् सूखा नियंत्रण।

इस वन नीति संरक्षण को ध्यान में रख कर निम्न कदम उठाये गए हैं-

सबसे अधिक फसलों के उत्पादन वाले राज्य(States with highest production of crops)

सामाजिक वानिकी

इस वानिकी का मतलब होता है पर्यावरणीय,सामाजिक,व् ग्रामीण क्षेत्रो में विकास में मदद के उद्देश्य से वनों का प्रबंध और सुरक्षा तथा ऊसर भूमि पर वन रोपण।
राष्ट्रीय कृषि आयोग ने (सन 1976-1979) सामाजिक वानिकी को तीन भागों में बांटा है-
1.फार्म वानिकी।
2. शहरी वानिकी।
3.ग्रामीण वानिकी।

फार्म वानिकी

इस वानिकी के अंतर्गत किसान अपने खेतों में व्यापारिक महत्त्व वाले या किसी दूसरे प्रकार के पेड़ लगता है। जिसके लिए वन विभाग के लोग छोटे-मोटे किसानों को फ्री में पौधे देते है। जिससे किसान पौधे को अपने घर के आसपास ,खेत की मेड पर या ख़ाली पड़ी जमीन पर लगता है।

शहरी वानिकी

शहरी वानिकी में शहरो के आस- पास की निजी व् सार्वजानिक भूमि जैसे- पार्क,सड़को के आस पास की जगह,हरित पट्टी, औद्योगिक व् व्यापारिक स्थलो पर वृक्ष लगाना आदि।

ग्रामीण वानिकी

इस प्रकार की वानिकी में कृषि वानिकी और समुदाय कृषि वानिकी को बढ़ावा दिया जाता है। कृषि वानिकी का अर्थ कृषि योग्य तथा बंजर भूमि पर पेड़ और फसले एक साथ लगाना। जिससे यह फायदा होता है कि आपको पेड़ो से लकड़ियों के साथ खाद्यान्य पदार्थ  भी मिलते है।

वन्य प्राणी

भारत में पाए जाने वाले जंगली जानवर ,पक्षियां हमारे लिए एक बहुत ही बड़े प्राकृतिक धरोहर है। हमें उन जीवो जंतुओं ,पक्षियों को हमेशा संभाल कर रखना चाहिए। इस लिए भारत सरकार ने बड़े -बड़े चिड़िया घर खोले हैं ताकि पशु पक्षियों को सुरक्षित रख सके।

एक अनुमान के अनुसार विश्व के कुल ज्ञात पौधों तथा प्राणियों में से ,4 से 5% भारत में पाई जाती है। आज समय ऐसा आ गया है कि कुछ प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर है, जिसका कारण इस प्रकार है-
1.मानवीय बस्ती,खेती,खदानों,जलाशयों आदि की लिए जमीन से कई वृक्षो का सफाया किया गया।
2. जंगलो में आग लगने से भी वन में रहने वाले कई प्राणियों पर इसका काफी प्रभाव पड़ा।
3. बहुत से लोग जंगली जानवरों का शिकार करना एक खेल समझते हैं जिसके वजह से कई जानवर प्रतिवर्ष मरते है।

 

भारत में वन्य प्राणी संरक्षण

वन्य प्राणी अधिनियम सन 1972 मे पास हुआ, यह कानून वन्य प्राणियों के संरक्षण तथा रक्षण की रूप रेखा तैयार करता है। इस अधिनियम के मुख्यता दो उद्देध्य है-

1.नेशनल पार्क पशु विहार जैसे क्षेत्रों को कानूनी सहायता प्रदान करना।

2. अनुसूची में सूचीबद्ध संकटापन्न प्रजातियों को सुरक्षा प्रदान करना।

इन अधिनियमो को सन 1991 में पूर्णतया संशोधित कर दिया गया था,जिसके तहत भारत सरकार ने कठोर सजा का प्रावधान रखा है।

भारत देश में लगभग 103 से ज्यादा नेशनल पार्क और 535 वन्य प्राणी शामिल हैं।
यूनेस्को के ‘मानव और जीवमंडल योजना’ के तहत भारत सरकार ने वनस्पति जाति और प्राणी जात के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाये है।

भारत सरकार ने कुछ योजनाएं भी चलाये हैं इन जानवरों को सुरक्षित रखने के लिए । भारत सरकार ने सन 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर जैसी योजना का शुभारंभ किया इसके बाद सन 1992 में प्रोजेक्ट एलीफैंट जैसी योजना को चलाया।

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