हड़प्पा सभ्यता(सिंधु घाटी की सभ्यता) का इतिहास History Of Hadappa Sabhyta

 विश्व की प्राचीन सभ्यताएं

हमारे देश में, कुछ लोग शहरो में रहते है तो कुछ लोग गाँवो में ,पर दोनों लोगो के रहन सहन में कुछ अंतर तथा कुछ समानताये भी होता है।
आज से करीब 2500 साल पहले भी भारत में नगर के अवशेष मिले है जो आज की नगर निर्माण के तौर तरीकों से मिलते जुलते है। संसार के पुराने नगर सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे ही हुआ था।

नदियों के किनारे बसे होने के कारण उनको पीने के लिए पानी तथा अन्न उपजाने में काफी सहायता मिलता था। जिससे उनका काफी विकास हुआ। इनका ब्यापार जलमार्गो से होता था, जलमार्गो से इनका ब्यापार सस्ता,सुरक्षित तथा आसान रहता था। धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती गयी जिसके फलस्वरूप संसार में पहली बार अलग-अलग नदियों के सामने नगरीय सभ्यता का विकास हुआ,जिनमे सिंधु नदी के तट पर विकसित हुई सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता कहलायी। इसको सिंधु घाटी की सभ्यता भी कहते हैं।

इसके अलावा को सारी सभ्यताएं भी नदियों के किनारे अलग-अलग देशो में विकसित हुई, जैसे मिस्र की सभ्यता,मोसोपोटामिया की सभ्यता,क्रीट सभ्यता,चीन की सभ्यता आदि।

हड़प्पा सभ्यता(सिंधु घाटी की सभ्यता-2500 ई०पू०-1520 ई०पू०)

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हड़प्पा सभ्यता

 

आखिर कैसे हुई खोज

सन 1921 में जब भारत में अंग्रेजो का राज था, इसी वर्ष  पंजाब के हड़प्पा नमक स्थल पर कई अवशेषो की प्राप्ति हुई। जिन अवशेषों का अध्यन करने पर, पुरातत्वविदों ने बताया कि यह एक नगरीय सभ्यता के अवशेष है जिससे हड़प्पा सभ्यता की खोज हुई।
इस प्रकार सिंध प्रांत में एक गांव मिला जिसको लोगो ने मोहनजोदड़ो नाम दिया। मोहनजोदड़ो का मतलब मृतकों का टीला।

नगरों की विशेषताएँ-

हड़प्पा सभ्यता की खोज के बाद और कई जगहों पर धीरे-धीरे और भी खोज हुई।ये नगर सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के घाटियों पर बसे हुए थे।

इस सभ्यता के कुछ क्षेत्र आज पाकिस्तान में है।भारत देश में रोपड़(पंजाब),दायमाबाद(महाराष्ट्र),लोथल(गुजरात),कालीबंगा(राजस्थान) इस सभ्यता से सम्बंधित मुख्य पुराने स्थल है।हड़प्पा काल के नगरों का निर्माण एक निश्चित योजना के तहत किया गया था। यहाँ के नगर की सड़के काफी चौड़ी थी,तथा वे छोटी-छोटी गलियों से जुडी हुई थीं।

इन्होंने सड़को के किनारे पक्की नालियाँ भी बनवा रखी थी। हर घर की नाली बड़े नालों में मिलती थी , जिससे पानी बहने में काफी आसानी हो। इस सभ्यता के लोग साफ-सफाई के प्रति काफी जागरूक थे।

घरो का निर्माण

कई जगहों पर खोदने पर कई तरह के बड़ी इमारते मिली जो आयताकार थीं।कई छोटे- मोटे घर तो कई दो मंजिला घर थे। इनके प्रत्येक घर के अन्दर आँगन होता था,तथा आँगन के चारो तरफ कमरे बने होते थे। इनके लगभग हर भवनों में शौचालय ,स्नानघर तथा रसोई घर रहता था।

दो मंजिला मकानों पर जाने के लिए इन्होंने सीढियो का भी प्रबंध कर रखा था।हड़प्पा सभ्यता की नगरों के खोदाई में पक्के भवनों के अलावा कई बड़े-बड़े गोदाम भी मिले थे। इन्ही गोदामो में आसपास के गांवो के सभी अनाज रखे जाते थे। मोहनजोदड़ो में एक पक्का और बड़ा सा स्नानगृह मिला था, जिसके चारों तरफ कमरे बने थे।

इनका रहन -सहन

हड़प्पा के लोग सूती तथा ऊनी दोनो प्रकार के कपडे पहनते थे। इनका मुख्य भोजन गेँहू,चावल था। हड़प्पा वासी कपास,मटर, तिल, गेंहू तथा चावल की भी खेती करते थे। गाय,भैंस,बकरी,सूअर,ऊंट,हाथी, बैल इनके पालतू पशु थे।
ये लोग आभुषण भी पहनते थे, जिनमे कंगन,हार, पाजेब,अंगूठी तथा बाली मुख्य आभूषण थे। चन्हूदड़ो से मनका बनाने का कारखाना भी प्राप्त हुआ है।

काम -धंधे

खुदाई में कई दर्पण,आरी,कंघिया,कांसे की बनी हुई कुल्हाड़ी प्राप्त हुए हैं। जिससे यह सिद्ध होता है कि हड़प्पा के लोग जमीन से निकालकर उसे साफ कर तथा उसे गला कर अन्य चीज़ों को बनाने में माहिर थे।
ये लोग मिटटी के बर्तन,कांसे की मूर्तियां, आभूषण बनाने में काफी माहिर थे।

ब्यापार

हड़प्पा के नगरों से खुदाई में हाथी के दांत,धातु,पत्थर,तथा मिटटी के बने कई चीज़े मिली है। इन लोगो को मुहरों का भी ज्ञान था। जब ये किसी को अपना सामान बेचते थे तो उस पर अपना मुहर लगा देते थे।

इनके मुहरों पर पौधे,जानवर,बर्तन तथा इंसानो के चिन्ह  बने रहते थे। ये लोग तौल तथा नाप के लिए बटखरे का प्रयोग करते थे। जिनकी तरह ही मोहरे कई देशों में भी पाई गयी खासकर मोसोपोटामिया में।उन दिनों मोसोपोटामिया और हड़प्पा के बीच ब्यापार होता था।

लिखावट

हड़प्पा वासियो के मोहरो पर संकेत के रूप में लेख लिखे गए थे, जिससे उनके अक्षर चित्रो के रूप में दिखाई पड़ते थे। बिद्द्वान आज भी इनकी लिखावट को नहीं पढ़ पाये हैं। इसलिए हड़प्पा सभ्यता को आद्य ऐतिहासिक के अंतर्गत रखते है।

देवी -देवता

हड़प्पा की खुदाई में कई मुर्तिया मिली है जो की पत्थर की थीं। जिनके सिर पर भैंस के सींग का चित्र तथा मूर्ति के चारो तरफ कई सारे जानवर बने थे।

सिंधवासी इसे पशुओं का देवता मानकर इसकी पूजा करते थे। इतिहासकारो के अनुसार हड़प्पावासी शिव की शक्ति,पशु पूजा,मातृ शक्ति की उपासना,तथा बृक्ष की पूजा करते थे।

हड़प्पा सभ्यता के नगरों का खत्म होना

करीब चार से पांच हजार साल पहले हड़प्पा में नगर बने थे। ये नगर लगभग एक हजार साल तक बने रहे,इसके बाद में नष्ट हो गये और मिटटी में दब गए।
लेकिन यह नगर कैसे नष्ट हुआ, इसका कारण आजतक स्पष्ट नहीं है।हड़प्पा सभ्यता के नष्ट होने के बाद भारत में कई वर्षों तक कोई भी नगर नहीं बसा।

मिस्र सभ्यता(5000 ई०पू०-2000 ई०पू०)

मिस्र की सभ्यता को नील नदी का बरदान भी कहते है। जब कोई ब्यक्ति की मौत हो जाती थी तो उसे मिस्र के लोग शव को सुरक्षित रखने के लिए,शव पर नाइट्रोजन का लेप लगाकर शव को पतले एवं मुलायम कपड़ो से ढक देते थे। तथा उसे पिरामिड में रख देते थे तथा इनके साथ बाह्मूल्य चीज़ों को भी रखा जाता था। जिसे ममी भी कहा जाता है।

मेसोपोटामिया सभ्यता(5000 ई०पू०-2000 ई०पू०)

मोसोपोटामिया की सभ्यता(इराक) दजला-फरात नदी के किनारे विकसित हुई थी। जिगुरत में इनके प्रमुख देवता रहते थे। जिगुरत की ऊंचाई 21मीटर है।

क्रीट सभ्यता(3000 ई०पू०-1500 ई०पू०)

क्रीट की सभ्यता को महानद्वीप की भी सभ्यता कहते है। क्रीट की सभ्यता भूमध्य सागर के किनारे विकसित हुआ था।इस सभ्यता के लोग बहुत ही अच्छे चित्रकार थे।ये लोग काफी अच्छे बर्तनों को बनाते थे। जिससे अन्य सभ्यता वाले लोग इनकी बर्तनों की मांग काफी ज्यादा करते थे।

चीन की सभ्यता

यह सभ्यता काफी विकसित सभ्यता थी। यह सभ्यता चीन के ह्वांगहो नदी के किनारे विकसित हुई थी।चीन के सभ्यता ने ही सर्वप्रथम कपडे,बांस पर लिखना प्रारम्भ किया था। तथा इन्होंने ही सर्वप्रथम कागज को खोजा।

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